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Category: Poetry

ग़ज़ल 011 – जिंदगी जब भी

ग़ज़ल 011 – जिंदगी जब भी

जिंदगी जब भी तुझको पुकारा है तूने हर बार आने से नकारा है। ऐसी क्या ख़ता हो गई हैै हमसे यूं जुल्म ढाना तुमको गंवारा है। बनता है कोई तिनके का सहारा गरजते तूफां सा तूने ललकारा है काँचता सा है बीते लम्हों का सच जो बच गया है हिस्सा हमारा है। रात चाँदनी का साया जो छाता है याद वही शख्स आता दोबारा है। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 010 – जिंदगी से चाहिए

ग़ज़ल 010 – जिंदगी से चाहिए

जिंदगी से चाहिए जो वो कभी मिलता नहीं साथ थे जिस गैर के साथ वो चलता नहीं। जिंदगी है जुस्तजु या फिर कोई अहसान है साँसें देती है सबक पर सिला मिलता नहीं। हर ख़याल है अंधेरा और बस कुछ भी नहीं रोशनी का जादू भी मुझ पे अब चलता नहीं। मेरे जज़्बातों की कीमत.. क्यों न रखी आपने फैसले में बाँधा ऐसा लब तलक हिलता नहीं। ज़ख्म इतने मिल चुके हैं.. कुछ पुराने हो चुके फिर कुरेदा है इन्हें………

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ग़ज़ल 009 – बस्तियाँ

ग़ज़ल 009 – बस्तियाँ

बस्तियाँ हैं. पर घर नहीं है अब ज़माने से डर नहीं है। यूँ कहने को… सफर कई हैं पर चलने को डगर नहीं है। इसमें किसी की क्या ख़ता है शब ही शब है.. सहर नहीं है। नाहक कब से से माँग रहे है किसी दुआ में असर नहीं है। दिल से याद हैं करते हरदम लेकिन उनको खबर नहीं है। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 008 – पराया

ग़ज़ल 008 – पराया

साया भी जिंदगी से सताया सा लगता है तन्हाई से मिलकर कतराया सा लगता है। साँस भी घर अपने ज़रा देर से आती है रास्ते में मौत ने…. डराया सा लगता है। अपने दर, दरीचे, दरवाजे़ पहचानते नहीं हैं अपना दीवारों दर भी पराया सा लगता है। बड़ी मुद्दतों बाद….. कोई घर आया है कोई पुराना कर्ज़ बकाया सा लगता है। अब इन दिल के पुरज़ों का क्या हिसाब दूँ अपने किए पर वो पछताया सा लगता है। ~~ अश्विनी…

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ग़ज़ल 007 – कल रास्तों में

ग़ज़ल 007 – कल रास्तों में

कल रास्तों में गम.. के साये होंगे आज अपने हैं तो कल पराये होंगे। ख्वाब में क्या देखकर मुस्कुराते हैं फ़क़त नींदों में खौफ.. खाए होंगे। इस जमाने के कर्ज़दार. बन गए अब मांगने वाले सर उठाये होंगे। फैसले पर हौसले.. काबिज़ हो चले कहीं रात फिर जाम छलकाये होंगे। देखिये क्या सिला मिला ज़िन्दगी से क्या सोच कर ये दिन दिखाये होंगे। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 006 – शख़्स

ग़ज़ल 006 – शख़्स

हर शख़्स का इक.. नाम होता है हर राही का इक मुकाम होता है। गै़र भी अमूमन याद आ जाते हैं जब कोई ज़रूरी.. काम होता है। सजदे़ में झुक जाता है सर उनके हाथों में जिनके लगाम होता है। भीड़ में खोकर सब जुदा दिखते हैं हर खास शख़्स भी आम होता है। हर लम्हा मौत के.. साये में रहता है सर जिसके संगीन इल्ज़ाम होता है। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 005 – दीवाना

ग़ज़ल 005 – दीवाना

हर शब तेरे नाम का… हसीं तराना है तेरे अल्फ़ाज़ों में इसे… गुनगुनाना है। जुनूं चढ़ा है मुझ पर शायद इश्क़ का पर कहते हैं लोग पागल-दीवाना है। पा लिया है सब कुछ तुझे पाने के बाद बाकी नहीं है कुछ जो अब कमाना है। देखा है तेरे साथ.. इक दोस्ती का ख्वाब सीखा तुझी से मैने क्या होता निभाना है। लगते हैं खिलखिलाते वो सारे गुज़ारे पल गम भी कोई शय है ये किसने जाना है। बन गया है…

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ग़ज़ल 004 – पहचान

ग़ज़ल 004 – पहचान

किस्मत अपनी नाप रही हद ऊँचे आसमान की ज़र्रा ज़र्रा मुझसे वाकिफ कमी नहीं पहचान की। चाँद सितारों सी ऊँची है मेरी हसरत की चादर यहाँ रात के मंजर देखे देखी दिन की शान भी। जज़्बा लेकर दिल में तो बच्चा भी आगे बढ़ता है पंखों को फैलाकर अपने करता जुगत उड़ान की। झगड़ा लफड़ा, तू-तू-मैं-मैं अपने बस की बात कहाँ चैन की बंसी रखता हूँ क्या करू मैं ढाल कमान की। मेहनत से ही हासिल है आलस फल का…

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ग़ज़ल 003 – इतनी बेपनाह चाहत

ग़ज़ल 003 – इतनी बेपनाह चाहत

इतनी बेपनाह… चाहत क्यों करे लगाए दिल मोहब्बत क्यों करे। दुश्मनी है क्या…. मैं जानता नहीं शक्लो सूरत से नफरत क्यों करे। न मैं राहे चराग़…. न ही आफताब मुझसे रौशनी की हसरत क्यों करे। आदतों में अब… बचपन रहा नहीं शोख चंचल सी शरारत क्यों करे। लहू के रंग में छुपा. है क्या अदब क्यों झुकाएँ सर ज़हमत क्यों करे। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

नस्ल ये इन्सान की और आदतें हैवान सी। दुश्मन  है ये अनाज की न काज की न काम की। रातें हैं उजली दिन अँधेरे जो ज़िद चढ़े परवान की। जिस्म ये तेरा नाकाफी है पर बड़ी है कीमत जान की। मुझसे मैं और मैं ही मेरा क्यों ज़िद करे सम्मान की। ~~ अश्विनी बग्गा ~~