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Book Review: Child/God (Ketan Bhagat)

Book Review: Child/God (Ketan Bhagat)

Title: Child/God Author: Ketan Bhagat Genre: Fiction/Contemporary Publisher: Rumor Books India Chapters: 74 Pages: 351 Price: INR 299.00 ISBN: 978-81-92953-24-3 Rating: 5.0/5.0 Book Review The moment I heard about this book “Child/God” the first impression that I portrayed in my mind was a book about the relationship between a child and father. An imaginary series of events lined-up in my nerves about the ways of raising a child and revering the pristine soul like a God. I had prefixed it as the only subject and concern of…

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ग़ज़ल 006 – शख़्स

ग़ज़ल 006 – शख़्स

हर शख़्स का इक.. नाम होता है हर राही का इक मुकाम होता है। गै़र भी अमूमन याद आ जाते हैं जब कोई ज़रूरी.. काम होता है। सजदे़ में झुक जाता है सर उनके हाथों में जिनके लगाम होता है। भीड़ में खोकर सब जुदा दिखते हैं हर खास शख़्स भी आम होता है। हर लम्हा मौत के.. साये में रहता है सर जिसके संगीन इल्ज़ाम होता है। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 005 – दीवाना

ग़ज़ल 005 – दीवाना

हर शब तेरे नाम का… हसीं तराना है तेरे अल्फ़ाज़ों में इसे… गुनगुनाना है। जुनूं चढ़ा है मुझ पर शायद इश्क़ का पर कहते हैं लोग पागल-दीवाना है। पा लिया है सब कुछ तुझे पाने के बाद बाकी नहीं है कुछ जो अब कमाना है। देखा है तेरे साथ.. इक दोस्ती का ख्वाब सीखा तुझी से मैने क्या होता निभाना है। लगते हैं खिलखिलाते वो सारे गुज़ारे पल गम भी कोई शय है ये किसने जाना है। बन गया है…

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ग़ज़ल 004 – पहचान

ग़ज़ल 004 – पहचान

किस्मत अपनी नाप रही हद ऊँचे आसमान की ज़र्रा ज़र्रा मुझसे वाकिफ कमी नहीं पहचान की। चाँद सितारों सी ऊँची है मेरी हसरत की चादर यहाँ रात के मंजर देखे देखी दिन की शान भी। जज़्बा लेकर दिल में तो बच्चा भी आगे बढ़ता है पंखों को फैलाकर अपने करता जुगत उड़ान की। झगड़ा लफड़ा, तू-तू-मैं-मैं अपने बस की बात कहाँ चैन की बंसी रखता हूँ क्या करू मैं ढाल कमान की। मेहनत से ही हासिल है आलस फल का…

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ग़ज़ल 003 – इतनी बेपनाह चाहत

ग़ज़ल 003 – इतनी बेपनाह चाहत

इतनी बेपनाह… चाहत क्यों करे लगाए दिल मोहब्बत क्यों करे। दुश्मनी है क्या…. मैं जानता नहीं शक्लो सूरत से नफरत क्यों करे। न मैं राहे चराग़…. न ही आफताब मुझसे रौशनी की हसरत क्यों करे। आदतों में अब… बचपन रहा नहीं शोख चंचल सी शरारत क्यों करे। लहू के रंग में छुपा. है क्या अदब क्यों झुकाएँ सर ज़हमत क्यों करे। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

नस्ल ये इन्सान की और आदतें हैवान सी। दुश्मन  है ये अनाज की न काज की न काम की। रातें हैं उजली दिन अँधेरे जो ज़िद चढ़े परवान की। जिस्म ये तेरा नाकाफी है पर बड़ी है कीमत जान की। मुझसे मैं और मैं ही मेरा क्यों ज़िद करे सम्मान की। ~~ अश्विनी बग्गा ~~

ग़ज़ल 001 – इतना मिल जाता है

ग़ज़ल 001 – इतना मिल जाता है

इतना मिल जाता है लेकिन, कोई कमी सी खलती है कहीं गुज़र भर हो रही, तो कहीं ज़िदंगी ही चलती है। समझो बड़ी है अहमियत, इन छोटे-छोटे रिश्तों की सब धागे टूट जाते हैं तो, किस्मत हाथ मलती है। वक्त रहते अपने घर में, थोड़ा वक्त बिता लेते बारिशों में छत से धारा, दरिया सी फिसलती है। हो बुढ़ापे की लाठी, ये बस उसका ख्वाब रहा आँखों में आँसू लेकर, हर अरमान मसलती है। सबसे उम्दा सबसे रोशन , माँगे सारे ताजमहल हाथ धरे…

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Quote 020 – Relations

Quote 020 – Relations

रिश्ते प्रेशर कूकर के रबर की तरह लचीले बनाए रखिये। इससे मन का गुबार सही समय पर बाहर निकल जायेगा, रिश्तों का ज़ायका बना रहेगा और ज़िन्दगी में खुशियों की सीटियां बजती रहेगी।