ग़ज़ल 010 – जिंदगी से चाहिए

ग़ज़ल 010 – जिंदगी से चाहिए

जिंदगी से चाहिए जो वो कभी मिलता नहीं
साथ थे जिस गैर के साथ वो चलता नहीं।

जिंदगी है जुस्तजु या फिर कोई अहसान है
साँसें देती है सबक पर सिला मिलता नहीं।

हर ख़याल है अंधेरा और बस कुछ भी नहीं
रोशनी का जादू भी मुझ पे अब चलता नहीं।

मेरे जज़्बातों की कीमत.. क्यों न रखी आपने
फैसले में बाँधा ऐसा लब तलक हिलता नहीं।

ज़ख्म इतने मिल चुके हैं.. कुछ पुराने हो चुके
फिर कुरेदा है इन्हें…… अब लहू मिलता नहीं।

है तमन्ना कोई तितली. बाग में ठहरे कभी
कारे बदरा छा रहे हैं गुल कोई खिलता नहीं।

~~ अश्विनी बग्गा ~~

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