ग़ज़ल 009 – बस्तियाँ

ग़ज़ल 009 – बस्तियाँ

बस्तियाँ हैं. पर घर नहीं है
अब ज़माने से डर नहीं है।

यूँ कहने को… सफर कई हैं
पर चलने को डगर नहीं है।

इसमें किसी की क्या ख़ता है
शब ही शब है.. सहर नहीं है।

नाहक कब से से माँग रहे है
किसी दुआ में असर नहीं है।

दिल से याद हैं करते हरदम
लेकिन उनको खबर नहीं है।

~~ अश्विनी बग्गा ~~

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