ग़ज़ल 008 – पराया

ग़ज़ल 008 – पराया

साया भी जिंदगी से सताया सा लगता है
तन्हाई से मिलकर कतराया सा लगता है।

साँस भी घर अपने ज़रा देर से आती है
रास्ते में मौत ने…. डराया सा लगता है।

अपने दर, दरीचे, दरवाजे़ पहचानते नहीं हैं
अपना दीवारों दर भी पराया सा लगता है।

बड़ी मुद्दतों बाद….. कोई घर आया है
कोई पुराना कर्ज़ बकाया सा लगता है।

अब इन दिल के पुरज़ों का क्या हिसाब दूँ
अपने किए पर वो पछताया सा लगता है।

~~ अश्विनी बग्गा ~~

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