ग़ज़ल 004 – पहचान

ग़ज़ल 004 – पहचान

किस्मत अपनी नाप रही हद ऊँचे आसमान की
ज़र्रा ज़र्रा मुझसे वाकिफ कमी नहीं पहचान की।

चाँद सितारों सी ऊँची है मेरी हसरत की चादर
यहाँ रात के मंजर देखे देखी दिन की शान भी।

जज़्बा लेकर दिल में तो बच्चा भी आगे बढ़ता है
पंखों को फैलाकर अपने करता जुगत उड़ान की।

झगड़ा लफड़ा, तू-तू-मैं-मैं अपने बस की बात कहाँ
चैन की बंसी रखता हूँ क्या करू मैं ढाल कमान की।

मेहनत से ही हासिल है आलस फल का कातिल है
जो करना है सो भरना है क्यों सोचे खींचातान की।

~~ अश्विनी बग्गा ~~

Comments are closed.