ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

ग़ज़ल 002 – नस्ल ये इन्सान की

नस्ल ये इन्सान की
और आदतें हैवान सी।

दुश्मन  है ये अनाज की
न काज की न काम की।

रातें हैं उजली दिन अँधेरे
जो ज़िद चढ़े परवान की।

जिस्म ये तेरा नाकाफी है
पर बड़ी है कीमत जान की।

मुझसे मैं और मैं ही मेरा
क्यों ज़िद करे सम्मान की।

~~ अश्विनी बग्गा ~~

Comments are closed.